Abhinavagupta Millennium Celebrations, 2016-2017

(आचार्य अभिनवगुप्त सहस्राब्दी समारोह, २०१६-२०१७.)

आचार्य अभिनवगुप्त का रचना संसार

स्रोत: Acharya Abhinav Gupt       तारीख: 22-Dec-2015

बताया जाता है कि अभिनव  गुप्त  ने लगभग 42 पुस्तकें लिखीं थी। लेकिन आज उन में से कई तो उपलब्ध ही नहीं हैं। कुछ अधूरी पांडुलिपियां भी मिली हैं। तंत्र और शैव दर्शन के बारे उन के प्रमुख ग्रंथों में तंत्रालोक और लाघवी और बृहत विमर्शिनी सब से महत्त्वपूर्ण हैं। तंत्रालोक तंत्र और शैव साधना पर विश्वकोषीय आकार का विशाल ग्रंथ है। इसी विषय को कम शब्दों और सरल भाषा में समझाने के लिए उन्होंने एक और छोटा ग्रंथ लिखा जिस का नाम रखा गया तंत्रसार। इसी वर्ग में परमार्थसार भी शामिल है। संक्षिप्त और बृहत विमशिनियां अपने गुरु उत्पलाचार्य की प्रसिद्ध पुस्तक ईश्वर प्रत्यभिज्ञा कारिका पर भाष्य है। इस के अतिरिक्त कुल परम्परा पर लिखी मालिनी विजया वार्तिका और परात्रिंशिका विवर्ण उन की महत्त्वपूर्ण कृतियां हैं। परात्रिंशिका विर्वण वास्तव में रुद्रमाला तंत्र के 36 पदों का भाष्य है। मालिनी विजया तंत्र पर उन्होंने एक पुस्तक श्रीपूर्व शास्त्र लिखी थी लेकिन वह अब उपलब्ध नहीं है। उनकी आरम्भिक रचनाओं में बोध पंचदर्शिका और पूर्णपंचिका जैसी पुस्तकों का उल्लेख है। इनमें दूसरी अब नहीं मिलती ।

कई स्तोत्रों, जिन में भैरव स्तोत्र सब से प्रसिद्ध है के अतिरिक्त उन की तीन महत्त्वपूर्ण रचनाएं प्रत्यक्ष रूप से शैव दर्शन के बारे में नहीं है, यद्यपि उन पुस्तकों की रचना का उद्देश्य शैव दर्शन की दृष्टि से ही व्याख्या करना है। पहली रचना है भगवतगीता संग्रह। इसमें अभिनव गुप्त ने गीता को विद्या और अविद्या के बीच संघर्ष के रूप से देखा है और यह नतीजा निकाला है कि परम चैतन्य के साक्षात्कार पर ही मोह से मुक्ति मिल सकती है। अन्य दो रचनाएं सौंदर्यशास्त्र अैर नाट्यशास्त्र के बारे में हैं। पहली अभिनव भारती भरत मुणि की रचना पर अपनी टीका है तो दूसरी लोचना आनंद वर्धन के ध्वन्यालोक पर। इस वर्ग में अभिनव गुप्त ने एक और पुस्तक लिखी थी जो उन के गुरु भट्ट तोता की एक रचना पर आधारित थी। लेकिन यह पुस्तक काव्यकौतुक विवर्ण उप्लब्ध नहीं है। कुछ लेखकों ने कुछ और अनुपलब्ध पुस्ताको की सूची दी है जिन मे अनुभव निवेदनम, देहास्थ देवता चक्रम, परामार्थ द्वादशिका , प्रकिरणका विवर्ण आदि हैं।