Abhinavagupta Millennium Celebrations, 2016-2017

(आचार्य अभिनवगुप्त सहस्राब्दी समारोह, २०१६-२०१७.)

मधुराजा योगिन के शब्दों में अभिनवगुप्त का शब्दचित्र

स्रोत: Acharya Abhinav Gupt       तारीख: 29-Dec-2015

आचार्य अभिनवगुप्त का शब्द चित्र

 प्रभावान दक्षिणमूर्ति (अभिनवगुप्त) जो साक्षात शिव के ही अवतार हैं हमारी रक्षा करें! अपनी करुणा के कारण ही वे एक नया शरीर धारण करके काश्मीर भूमि में अवतरित हुए हैं। वे सुनहरे अंगूरों की वाटिका के बीच एक मण्डप में विराजमान हैं, जो रत्नजड़ित है और जिसके भीतर सुंदर कलाकृतियाँ लगी हुईं हैं। मण्डप में चारों ओर फूलों, अगरबत्तियों और प्रज्वलित दीपकों की सुगंध फैली है। इसकी दीवारों पर चंदन का लेप लगा हुआ है। गीत-संगीत और नृत्य से कक्ष गूंज रहा है।

चारों ओर योगिनियाँ, ज्ञानीजनों और चमत्कारिक शक्ति वाले सिद्धों की भीड़ है। स्वर्ण और रत्नजड़ित आसन के ऊपर एक चांदनी छाई है। अभिनवगुप्त के सामने उनके कई शिष्य बैठे हैं, जो उनका हर शब्द लिखने को आतुर हैं। इनमें सबसे प्रमुख क्षेमराज हैं। अभिनवगुप्त आध्यात्मिक आनंद की अवस्था में हैं और उनकी आंखों की पुतलियाँ उल्लास के कारण नाच रही हैं। उनके माथे के बीच भस्म का तिलक लगा है। उनके एक कान में रुद्राक्ष लटक रहा है और उनके सुंदर लम्बे केश फूलों की माला से पीछे की ओर बंधे हुए हैं। उन की दाढ़ी लम्बी है और तन का रंग स्वर्णिम है। उन की ग्रीवा चमकदार यक्षपंक भस्म के कारण काली है। ग्रीवा से उनका उपवीत नीचे की और लटक रहा है। वे चांद की किरणों की भांति धवल रेशम के वस्त्र पहने योगासन में बैठे हैं, जिसे वीर मुद्रा कहते हैं। उनका एक हाथ घुटने पर है, हाथ में माला है और ऐसी मुद्रा में है जो उन की परम-चैतन्य की अनुभूति का प्रतीक है। कमल जैसे सुंदर दूसरे हाथ की उंगलियों से वे अपनी वीणा के तार बजा रहे हैं।